क्यों भारत की लॉर्ड्स टेस्ट जीत, आश्चर्यचकित करने वाली नहीं है?

ऑफ़ स्पिनर की एक बेहतरीन गेंद। स्नेह राणा ने लाल गेंद को फ़्लाइट दी, उसे सही जगह टप्पा कराया और इतनी टर्न दिलाई कि वह सोफ़ी एकलस्टन के बल्ले के अंदरूनी किनारे को चकमा देकर सीधे स्टंप्स पर जा लगे। इसी गेंद ने भारत के लिए एक ऐतिहासिक नतीजा तय किया।

भारत ने इंग्लैंड को लॉर्ड्स में खेले गए पहले महिला टेस्ट में 270 रन से हराया। यह बहुत बड़ी उपलब्धि थी, लेकिन इसे बिल्कुल अप्रत्याशित नतीजा भी नहीं कहा जा सकता।

हाल के टेस्ट रिकॉर्ड भारत के पक्ष में रहे हैं। भारतीय टीम ने इसी साल मार्च में एक टेस्ट मैच खेला था, जबकि इंग्लैंड का पिछला लाल गेंद का मुक़ाबला जनवरी 2025 में हुआ था। इसके अलावा, पिछले रविवार इसी मैदान पर T20 विश्व कप फ़ाइनल खेलने के बाद इंग्लैंड के पास फ़ॉर्मेट बदलने के लिए बहुत कम समय था। टीम को लाल ड्यूक गेंद के साथ तालमेल बैठाने के लिए सिर्फ़ दो अभ्यास सत्र मिले। दूसरी ओर, लगातार दूसरे T20 विश्व कप में लीग चरण से बाहर होने के कारण भारत को तैयारी के लिए अधिक समय मिला। टीम ने सेंट जॉन्स वुड पहुंचने से पहले कुछ दिन वॉर्म्सली क्रिकेट क्लब मैदान पर भी अभ्यास किया।

हालांकि, भारत की टेस्ट सफलता की सबसे बड़ी वजह घरेलू क्रिकेट में होने वाला लाल-गेंद टूर्नामेंट है। भारत के महिला घरेलू क्रिकेट सर्किट में 2017-18 सीज़न तक मल्टी-डे टूर्नामेंट होता था, लेकिन बाद में इसे बंद कर दिया गया। महिला टेस्ट मैचों की कमी को देखते हुए BCCI ने इसकी जगह अतिरिक्त सफ़ेद गेंद के और एज़ ग्रुप घरेलू टूर्नामेंट शुरू कर दिए। लेकिन जून 2021 में टेस्ट क्रिकेट में वापसी के बाद जब भारत नियमित रूप से टेस्ट खेलने लगा, तब घरेलू स्तर पर खिलाड़ियों को तैयार करने के लिए एक मज़बूत व्यवस्था की ज़रूरत महसूस हुई।

2023-24 सीज़न से सीनियर महिला इंटर-ज़ोनल मल्टी-डे ट्रॉफ़ी को घरेलू कैलेंडर में शामिल किया गया, जिससे खिलाड़ियों को लाल-गेंद की क्रिकेट में अपने कौशल को निखारने का मौक़ा मिले। इसका असर यह रहा कि लॉर्ड्स टेस्ट में भारत की प्लेइंग XI की कम से कम आठ खिलाड़ियों ने, और चोट के कारण बाहर हुई प्रतिका रावल सहित पूरी टीम की 12 खिलाड़ियों ने, पिछले दो वर्षों में कम से कम एक लाल-गेंद का मैच खेला था। मार्च में हुए इंटर-ज़ोनल टूर्नामेंट में रावल और उनकी जगह टेस्ट टीम में शामिल की गई प्रिया पुनिया दोनों ने शतक लगाए थे।

यास्तिका भाटिया भले ही अब तक सिर्फ़ चार टेस्ट मैच खेली हों, लेकिन लाल-गेंद की क्रिकेट का उनका अनुभव इससे कहीं ज्यादा है। उन्होंने 13 प्रथम श्रेणी मैच खेले हैं। लॉर्ड्स में वह महिला टेस्ट इतिहास की पहली शतक लगाने वाली बल्लेबाज़ बनीं। स्मृति मांधना, भारत के लिए टेस्ट क्रिकेट में नौ मैचों में 788 रन के साथ दूसरी सबसे ज़्यादा रन बनाने वाली बल्लेबाज़ हैं। उनके नाम 15 प्रथम श्रेणी मैच भी दर्ज हैं। यही अनुभव पूरे टेस्ट के दौरान इंग्लैंड को दबाव में रखने के काम आया।

अगर इसकी तुलना करें तो इंग्लैंड की तरफ़ से सबसे अधिक अंतरराष्ट्रीय मैच खेलने वाली खिलाड़ी हीदर नाइट ने भी 15 प्रथम श्रेणी मैच खेले हैं। लेकिन उनके सभी प्रथम श्रेणी मुक़ाबले, उच्च दबाव वाले टेस्ट मैच ही रहे हैं। यही वजह है कि लॉर्ड्स टेस्ट के बाद अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट से संन्यास लेने वाली नाइट ने इंग्लैंड में लाल-गेंद की घरेलू महिला टूर्नामेंट शुरू करने की मांग की।

उन्होंने कहा, "मैं चाहूंगी कि घरेलू स्तर पर कुछ लाल-गेंद की क्रिकेट खेली जाए। मुझे लगता है कि यह खिलाड़ियों के आगे बढ़ने का बड़ा माध्यम बनेगा। जब हम टेस्ट मैच खेलते हैं तो बहुत कुछ सीखते हैं। अगर तैयारी का पूरा समय मिले तो आप खेल को बेहतर समझते हैं। आप सीखते हैं कि लगातार एक जैसी गेंदबाज़ी या बल्लेबाज़ी कैसे करनी है, लंबे समय तक एकाग्रता कैसे बनाए रखनी है और मानसिक रूप से ख़ुद को कैसे तैयार रखना है। यह कहां और कैसे फ़िट होगा, इसका फ़ैसला मुझसे ऊपर बैठे लोग कर सकते हैं।

"लेकिन मैं ज़रूर चाहूंगी कि कम से कम कुछ घरेलू लाल-गेंद के मैच हों, भले ही उनमें सिर्फ़ सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ी हिस्सा लें। ज़रूरी नहीं कि यह पूरे घरेलू कैलेंडर का हिस्सा हो, लेकिन मेरा मानना है कि इससे हम बेहतर सफ़ेद-गेंद के भी क्रिकेटर बनेंगे। लाल-गेंद की क्रिकेट आपको वही बुनियादी तकनीक और कौशल देता है, जिसकी ज़रूरत सीमित ओवर क्रिकेट में भी होती है। हालांकि ऐसा कभी होगा या नहीं, मैं नहीं जानती।

"भारत को तैयारी के लिए थोड़ा ज़्यादा समय मिला और उन्होंने शानदार क्रिकेट खेली। उनका प्रदर्शन बेहतरीन था। उनका दबाव में स्किल बनाए रखना और मैच की स्थिति को समझकर खेलना काफी प्रभावशाली था। इसलिए पूरा श्रेय उन्हें जाता है।

"हमारे लिए भी यह आसान नहीं है। लेकिन जब मैं छोटी थी, तब मुझे हमेशा यही सिखाया गया कि अपना विकेट बचाकर रखो, विकेट की क़ीमत समझो। आज जो लड़कियां टीम में आ रही हैं, वे T20 और शायद 50 ओवर क्रिकेट खेलते हुए बड़ी हुई हैं। मुझे लगता है कि हमारी नई पीढ़ी की कई खिलाड़ी 50 ओवर क्रिकेट की तुलना में T20 में ज्यादा मज़बूत हैं। बल्लेबाज़ी में लंबी पारी खेलना या गेंदबाज़ी में लगातार दबाव बनाए रखते हुए स्पेल डालना, अब काफ़ी मुश्किल हो गया है।"

इस समय महिला क्रिकेट में भारत के पास सबसे अनुभवी लाल-गेंद की खिलाड़ी हैं। भारत के अलावा किसी भी देश में महिलाओं के लिए पूरी तरह विकसित लाल-गेंद की घरेलू प्रतियोगिता नहीं है। मार्च में पर्थ में टेस्ट डेब्यू करने से पहले सायली सातघरे पांच प्रथम श्रेणी मैच खेल चुकी थीं। ऑस्ट्रेलिया ही दूसरा देश है, जहां महिलाओं के लिए घरेलू लाल-गेंद का मुक़ाबला खेला जाता है। वहां 2024 से CA ग्रीन और CA गोल्ड के बीच एक मैच आयोजित किया जा रहा है।

आंकड़ों के अनुसार, भारत ने इंग्लैंड में अब तक कोई महिला टेस्ट नहीं गंवाया है। इंग्लैंड के ख़िलाफ़ उनकी पिछली हार 1995 में जमशेदपुर में आई थी। इंग्लैंड के ख़िलाफ़ अपने पिछले दो टेस्ट में भारत ने इस प्रारूप की अपनी सबसे बड़ी और दूसरी सबसे बड़ी जीत दर्ज की है। महिला टेस्ट मैचों की कमी और घरेलू लाल-गेंद टूर्नामेंट के ढांचे में बड़े अंतर को देखते हुए भारत की इस उपलब्धि की अहमियत शायद उतनी नहीं हो रही, जितनी उसे मिलनी चाहिए।